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स्त्रियों में होती हैं इन चीजों को लेकर ज्यादा इच्छाएं, जानें चाणक्य नीति

आचार्य चाणक्य के अनुसार कुछ स्त्रियां इन नीति पर चलकर अपने जीवन में सफल हो चुकी है। लेकिन जिसने भी इस नीति को अपनाया है उसने सफलता हासिल जरुर की है। वैसे चाणक्य की नीति को अपनाना बहुत मुश्किल है।  
 
स्त्रियों में होती हैं इन चीजों को लेकर ज्यादा इच्छाएं, जानें चाणक्य नीति   

Khelo Haryana, New Delhi: आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रंथ नीति शास्त्र में जीवन के तमाम पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया है। चाणक्य ने श्लोक के माध्यम से सुख-दुख, धर्म, तरक्की, करियर व इच्छाओं के बारे में बताया है। चाणक्य ने एक श्लोक में बताया है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में कुछ चीजों को लेकर ज्यादा इच्छाएं होती हैं। जानें आज की चाणक्य नीति-
स्त्रीणां द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा ।
साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्टगुणः स्मृतः ॥१७॥

चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का आहार यानी भोजन दोगुना होता है। बुद्धि चौगुनी, साहस छह गुना और कामवासना आठ गुना होती है। आचार्य ने इस श्लोक में स्त्री की कई विशेषताओं का वर्णन किया है। स्त्री के कई ऐसे पक्ष हैं, जिन पर सामान्य रूप से लोगों की दृष्टि नहीं जाती।

भोजन की आवश्यकता स्त्री को पुरुष की अपेक्षा इसलिए ज्यादा है, क्योंकि उसे पुरुष की तुलना में शारीरिक कार्य ज्यादा करना पड़ता है। अगर इसे प्राचीन संदर्भ में भी देखा जाए, तो उस समय स्त्रियों को घर में कई ऐसे छोटे-मोटे काम करने होते थे, जिनमें ऊर्जा का व्यय होता था। आज के परिवेश में भी स्थिति लगभग वही है। शारीरिक बनावट, उसमें होने वाले परिवर्तन और प्रजनन आदि ऐसे कार्. हैं, जिसमें क्षय हुई ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए स्त्री को ज्यादा पौष्टिकता की आवश्यकता होती है।

सत्य की जानकारी न होने के कारण, बल्कि व्यवहार में इसके विपरीत आचरण होने के कारण, बालिकाओं और स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा कुपोषण का शिकार होना पड़ता है। बुद्धि का विकास समस्याओं को सुलझाने से होता है। इस दृष्टि से भी स्त्रियों को परिवार के सदस्यों और उसके अलावा भी कई लोगों से व्यवहार करना पड़ता है। इससे उनकी बुद्धि ज्यादा पैनी होती है, छोटी-छोटी बातों को समझने की दृष्टि का विकास होता है।

भावना प्रधान होने के कारण स्त्री में साहस की उच्च मात्रा का होना स्वाभाविक है। पशु-पक्षियों की मादाओं में भी देखा गया है कि अपनी संतान की रक्षा के लिए वे अपने से कई गुना बलशाली के सामने लड़-मरने के लिए डट जाती हैं। काम का आठ गुना होना, पढ़ने-सुनने में अटपटा लगता है लेकिन यह संकेत करता है कि हमने काम के रूप-स्वरूप को सही प्रकार से नहीं समझा है। काम पाप नहीं है।

स्त्री की कामेच्छा पुरुष से अलग होती है। वहां शरीर नहीं भावदशा महत्वपूर्ण है। स्त्री में होने वाले परिवर्तन भी इस मांग को समक्ष लाते हैं-स्वाभाविक रूप से। लेकिन स्त्री उसका परिष्कार कर देती है जैसे पृथ्वी मैले को खाद बनाकर जीवन देती है। इसे पूरी तरह से समझने के लिए कामशास्त्र का अध्ययन किया जाए।